आवश्यक सूचना एवं भूमिका – यह लेख किसी भी समुदाय या जगह को गलत तरह से पेश करने का प्रयास नहीं है | यह लेख एक चिंतन है जो लंबे समय तक एक जगह पे रहकर किए गए अवलोकन से उपजा है | और चिंता, उम्मीद, और जिज्ञासा के भाव से उस जगह को याद करने का तरीका है | इस लेख में जिस प्रकार वैज्ञानिक शोध होता है और उसे लिखा जाता है, उसकी छवि आपको दिखेगी | यह लेख अलग अलग विचारकों से उनके विचार लेकर और पढ़ के और कभी उनसे मिलकर बात करके, और समझ के लिखा गया है क्योंकि ये अंत में दुनिया की असलियत को देखने का एक और तरीका मात्र है | जैसे और अन्य चिंतन और उनकी अपनी टीकाएँ और उन पर की गयी टिप्पणियाँ है | इसलिए, ये लेख किसी लंबी वार्तालाप का एक हिस्सा मात्र है, और इसे आप सभी से साझा करने का उद्देश्य इस संवाद को आगे बढ़ाना है, उसमें जोड़ना है | कृपया इसे इसी प्रकार स्वीकार करें |
मंडल घाटी में हर नया दिन अपनी नई कहानी बुनता है, और कोई दो दिन एक समान नहीं गुजरते | मंडल घाटी किसी भी मध्य हिमालयी घाटी की तरह है , जो अपने बीच पनपते छोटे छोटे गाँवों से समृद्ध है, इसकी हवा में रीति-रिवाजों, परंपराओं, और संस्कृति की एक सूफी महक घुली है | मंडल घाटी के भूदृश्य की संरचना में मानव कृषि गतिविधि को दर्शाते खेत, क्रमशः आसपास फैले अरण्य से आके मिल जाते है | यह घाटी केदारनाथ वन्यजीव अभ्यारण्य का दक्षिणी प्रवेश द्वार है (श्रीवास्तव और अन्य, 2020) | हर सुबह, इस घाटी के निवासी अपने दैनिक कार्यों में लग जाते हैं | एक पटकथा की लिपि का जैसे पालन किया जाता हो | गौशाला की सफाई, गायों की देखभाल, लकड़ी, सूखी घास और चारा इकट्ठा करने के लिए जंगल में जाना, गांव के बाजार, या निकटतम शहर गोपेश्वर हो आना, या खेतों में काम करना। देखा जाए तो दैनिक जीवन में करने को सीमित ही गतिविधियां और संभावनाएं होती है मंडल घाटी में | और फिर भी, हर दिन दूसरे से अलग घटित होता है | ग्राम वासियों की तरह ही हम भी एक पटकथा लिपि का अवचेतन रूप से पालन करते| हम, इस लेख के लेखक, मंडल घाटी में हिमालयी लंगूर परियोजना (एच. एल. पी.) के अंतर्गत शोध कर रहे शोधकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं | एच. एल. पी. एक शोध समूह है जो आज जंगली हिमालयन लंगूर के व्यवहार का अध्ययन करता है और इस भूदृश्य के संरक्षण के हित में कार्यरत है (नौटियाल और अन्य, 2020) | वीरेंद्र उत्सुक थे हिमालयी लंगूरों के यात्रा मार्गों को समझने के लिए, और अपने शोध में यह जानना चाहते थे कि किस प्रकार लंगूरों के ये यात्रा मार्ग, और उनका भ्रमण और गतिशीलता, मनुष्य के साथ उनके सम्बन्ध को आकार देती है | आर्जव, एक एथनोग्राफी (एक जातीय अध्ययन) के माध्यम से ये जांच रहे थे कि मानव और प्रकृति के बीच पनपे संघर्ष किस प्रकार सामुदायिक रूप से अधिकृत वन क्षेत्र में पर्यावरण अनुसंधान प्रथाओं को प्रभावित करते है । (read more...)